सेवा भावना
सेवा भावना
बात उन दिनों कि है जब दास नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सचखंड एक्सप्रेस में लंगर बाँटने की सेवा किया करता था एक दिन पीछे के जरनल डिब्बों में लंगर बाँटने के लिए परशादों वाले कैरेट अभी रखे हि थे कि गाड़ी प्लेटफार्म पर आ पहुंची तभी एक सहजधारी हिन्दू बुजुर्ग जल्दी से मेरे पास आ गए मैने जल्दबाजी में कहा बाबा जी आप परशादे वाले कैरेट के पास बैठ कर ध्यान रखना कोई बेअदबी ना करे में अभी दूसरे कैरेट से पीछे वाले डिब्बे में में परशादा बांट कर आता हूँ यह कह कर दास पीछे चला गया इत्तेफाक से उस दिन गाड़ी जल्दी चल पड़ी और दास उस दूसरे कैरेट तक नहीं पहुंच सका यहां वो बुजुर्ग बैठे थे।
परन्तु जब दास पीछे से उस कैरेट को उठाने पहुंचा तो वह बुजुर्ग वहीं परशादे वाले कैरेट के पास बैठे थे मैने उनसे कहाँ लो बाबा जी अब आप भी परशादा शक लो बुजुर्ग ने कहा वो तो ठीक है पर मेरी गाड़ी छुट गई मैने बिआस जाना था दास चुप सा हो गया मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था तब बुजुर्ग ने मुझे बताय कि वह लंगर लेने के लिए गाड़ी से उतरे हि थे कि मैने उन्हें बैंच पर बिठा दिया था कि परशादो का ध्यान रखना।
मैने हैरान और परेशान होकर कहा बाबा जी परमात्मा मेरे गुनाह माफ करे मुझे नहीं पता था कि आप गाड़ी से उतरे हैं पर अगर गाड़ी चल पड़ी थी तो चड़ जाना था तो बुजुर्ग ने बड़े हि ठंडे लहजे में कहा तुने कहा था यही बैठ कर ध्यान रखना कोई बेअदबी ना करे अब बता में परशादों को छोड़कर कैसे जा सकता था।
मैने बुजुर्ग की सेवा भावना को देखते हुए उनके पैरी हाथ लगाया और मन में सोचा काश मुझ में भी ऐसी सेवा भावना आ सके खैर अपनी गलती की माफी माँगते हुए हमने गाड़ी में बैठी उनकी साथी संगत को फोन से इतला दी बाबा जी ठीक है उनकी गाड़ी छुट गई है वह डाई बजे वाली सुपर में आपके पास पहुंच जांएगे।
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