Behlol dana aur rab say milnay ka tariqa
10. खुदा से कैसे मिला जा सकता है
एक रोज बोहलोल साहिब बादशाह के महल के पास अपनी ही मस्ती में गुम बैठे थे तभी महल के ऊपर से बादशाह की नजर उन पर पढ़ी उन्होंने अपने सिपाहियों को बोहलोल साहिब को ऊपर उठा कर लाने का इशारा किया तो वह तुरंत सोते हुए बोहलोल साहिब को बादशाह के सामने उठा लाए।
बोहलोल साहिब ने होश संभाला तो खुद को बादशाह के सामने पाया।
बादशाह ने पूछा कैसे मिजाज है आपके वाहब साहिब
उन्होंने जवाब दिया अल्लाह का फजल है
बादशाह ने कुछ देर बातें करने के बाद बड़ी ही संजिदगी से पूछा एक बात तो बताएँ वाहब साहिब खुदा से कैसे मिला जा सकता है।
बोहलोल साहिब ने थोड़ी देर खामोश रहकर मुस्कराते हुए जवाब दिया बिल्कुल ऐसे ही जैसे में आप से मिल रहा हूँ ।
आप ने मुझे याद फरमाया तो आपके सिपाही मुझे उठा कर आपके पास ले आए ठीक इसी तरह खुदा भी जिनको याद फरमाते है खुदा के फरिश्ते भी उन्हें खुदा के पास उठा कर ले जाते हैं। हम अपनी मर्जी से खुदा को नहीं मिल सकते आप तो जानते ही हैं अगर बादशाहो से मिलना हो तो पहले अर्जी लिखनी पढ़ती है फिर उसे दीवान साहब के पास जमा करवाना पड़ता है वो साल छह महीने के बाद का समय देते हैं फिर भी बादशाह मिलें या ना मिलें यह उनकी मर्जी पर तय करता है बादशाहों से अपनी मर्जी से मिलना इतना मुश्किल है तो फिर वो तो बादशाहों का भी बादशाह है। पर जिस पर बादशाह की नजरें इनायत हो जाए उसके लिए तो बस इशारा ही काफी है। ठीक उसी तरह जिस पर खुदा की बख्शीश हो जाए उसके लिए तो बस इशारा ही काफी है वरना बंदे की क्या औकात जो खुदा से अपनी मर्जी से मिल सके।
बादशाह यह जवाब सुनकर सून सा हो गया।

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