Behlol dana aur falsafa ki kitab
2.बोहलोल साहिब और फलसफे की किताब
बोहलोल साहिब अपनी दीवानगी के आलम में भी पक्के नमाजी थे। वह नमाज़ के वक़्त हर हाल में मस्जिद में पहुँच जाया करते थे। एक रोज़ अभी आप ने अपने जूते मस्जिद के बाहर उतारे ही थे कि आपकी निगाह एक शख्स पर पड़ी वह शक्ल से ही चोर लग रहा था। बोहलोल साहिब बहुत देर इस इंतज़ार में थे कि वह शख़्स इधर उधर हो तो वह अपने जूते उतार कर नमाज़ मे शामिल हो। मगर वह शख्स वहीं डट कर खड़ा था।
इस पर बोहलोल साहिब ने तेजी से नजर बचाकर अपने जूतों को एक थैले में डालकर अपनी बग्ल में दबा लिया और दौड़कर नमाज़ के लिये खड़े हो गए।
नमाज के बाद एक नमाजी बोला मालूम होता है के आपके पास कोई क़ीमती किताब है जिसे आपने इतनी हिफाज़त से अपनी बग्ल में रखा हुआ है।
बोहलोल साहिब ने बड़ी सन्जीदगी से जवाब दिया जी बिल्कुल आप ने एक दम दुरूस्त फरमाया बहुत ही क़ीमती किताब है इस थैले में
उस शख़्स ने कहा: क्या आप बताना पसन्द करेंगे कि यह कौन-सी किताब है।
जी हाँ। क्यों नहीं। यह फलसफे की किताब है। बोहलोल साहिब ने जवाब दिया।
फलसफे की किताब सुब्हानअल्लाह आपने यह किताब कौन सी किताब की दुकान से ख़रीदी है।
जनाब यह मैंने एक मोची से ख़रीदी है। बोहलोल साहिब का
जवाब सुनकर। जो लोग उनकी दीवानगी से वाक़िफ थे। उन्हे हँसी रोकना मुश्किल हो गया।
उधर उसी चोर शख़्स ने जो जूतों को चुराना चाहता था मायूस होकर शोर मचाते हुए बोहलोल साहिब को टोका औ दीवाने जूतों समैत नमाज़ पढ़ते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई।
इस पर बोहोलल साहिब ने जवाब दिया मुझे तो बहुत शर्म आ रही थी पर शायद जूतों को नहीं आ रही थी।
वह चोर सुन सा हो गया।

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