Behlol dana aur rab se sulah
25.बोहलोल साहिब और बंदो की रब से सुलह
एक बार बोहलोल साहिब बगदाद की मस्जिद के बाहर अपनी ही मौज में बैठे हुए थे वहां बैठ कर पर मिट्टी पर एक लकीर खींचते और उसे चार लकीरों से काट देते पास खड़ा एक सौदागर यह सारा नजारा देख रहा था उसने बोहलोल साहिब के पास जा कर पूछा बोहलोल साहिब आप यह क्या कर रहे हैं
जवाब आया बंदो की और रब की सुलह करवा रहा हूँ पर बात नहीं बन रही
क्यों
जवाब आया रब तो मान रहा है पर बंदे नहीं मान रहे में क्या करूँ।
वह सौदागर बोहलोल साहिब को उनके हाल पर छोड़ अपने काम में मसरूफ हो गया।
समय बीता
बोहलोल साहिब कब्रिस्तान फिर अपनी ही मौज में बैठे हुए थे अब वह मिट्टी पर चार लकीरें खींच कर उसे एक लकीर से काट रहे थे।
इत्तेफाक से वही सौदगार वहां से गुजरा उसने फिर बोहलोल साहिब के पास जा कर पूछा बोहलोल साहिब आज आप यहां क्या कर रहे हैं
जवाब आया बंदो की और रब की सुलह करवा रहा हूँ पर बात फिर नहीं बन रही
अब क्यों नहीं बन रही
अब बंदे तो मान रहे हैं पर खुदा नहीं मान रहा।

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