Behlol dana aur karobar ka mashwara
17. बोहलोल साहिब और व्यापार का मशविरा
बोहलोल साहिब की दानशमंदी की हवा चारों तरफ फैलने लगी तो एक मगरूर सौदागर उनके पास आया और बोला हज़रत शेख़ बोहलोल साहब मेहरबानी फ़रमाकर मुझे मशविरा दें कि मैं कौन सा व्यापार करूँ जो नफ़ा बख़्श हो।
बोहलोल साहिब ने बड़े इत्मीनान से कहा जनाब आप लोहा और रूई का व्यापार करें अल्लाहताला बरकत देगा।
मगरूर सौदागर ने बोहलोल साहिब की बात पर अमल किया और उसे बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ।
दो ढाई माह बाद उस मगरूर संदागर ने फिर माल ख़रीदने का इरादा किया तो उसने सोचा क्यों ना फिर से बोहलोल साहिब से मशविरा ले लिया जाए। वह उनके पास आया और बड़े गरूर से बोला
ओ दीवाने पिछली दफा तुम्हारी सलाह से मुझे काफी मुनाफा हुआ था इस बार बेचने के लिये कौन सा माल ख़रीदूँ।
बोहलोल साहिब फ़ौरन बोल उठे जा तूॅ प्याज़ और तर्बूज़ का व्यापार कर।
उस मगरूर सौदागर ने बग़ैर सोचे समझे अपना तमाम सर्माया प्याज़ तर्बूज़ ख़रीदने में लगा दिया।
फ़सल अधिक होने कारण के वैसे ही उनकी माँग गिर गई थी। कुछ दिन भण्डार पड़ा रहा तो वह सड़ गये और उसे नुकसान उठाना पड़ा। वह ग़ुस्सा में भरा हुआ बोहलोल साहिब के पास आया और बोला। औ दीवाने तूने मुझे इस बार कैसा मशविरा दिया कि मेरा दिवाला ही निकल गया हालांकि पिछली बार तेरे मशविरे से मुझे बहुत मुनाफ़ा हुआ था।
बोहलोल साहिब बोले हज़रत पहले रोज़ जब आपने मुझसे मशविरा माँगा था। तो जनाब शेख़ बोहलोल कहकर मुझे आवाज़ दी थी। गोया आपने मुझे दानिशमन्द समझा था मैंने भी दानिशमन्दी से मशविरा दिया।
लेकिन दूसरी बार आपने फ़रमाया था। ओ दीवाने चूँकि आपने मुझे दीवाना समझा था। इसलिये मैंने आपको दीवानगी में ही मशविरा दिया था।
सौदागर अपनी भूल पर शर्मिंदा सा हो गया।

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