Behlol dana aur naik kamai
14. बोहलोल साहिब और नेक कमाई की बरकत
एक बार बोहलोल साहिब अपनी छड़ी पर सवार हो बगदाद के बाजार में घुम रहे थे कि वहां दो मांगने वाले आए तो बाजार के एक बड़े यहूदी व्यापारी ने उन्हें काफी पैसे खैरात में दिए कुछ देर बाद फिर बाजार मे एक और मांगने वाला आया तो एक साधारण व्यापारी ने उसे थोड़े से ही पैसे खैरात में दिए।
बच्चों से घिरे हुए अपने घोड़े पर सवार थोड़ी दूर खड़े बहलोल साहिब यह सारा नजारा बढ़ी संजिदगी से देख रहे थे तभी उन्होंने उस यहूदी व्यापारी को बाद में मांगने आने वाले के पीछे और साधारण व्यापारी को उन दोनों मांगने वालों के पीछे भेजा।
यहूदी और वह साधारण व्यापारी जब वापिस आए तो साधारण व्यापारी ने आकर बताया कि उन दोनों व्यक्तियों ने तो मांगे हुए पैसो से खुब अय्याशी की तथा यहुदी ने बताया उस बाद में मांगने आने वाले व्यक्ति ने जरूरी रसद खरीदी और अपने घर ले गया। तभी यहुदी ने पूछा आखिर ऐसा क्यों हुआ कि उन दोनों ने खैरात के पैसों से अय्याशी की और जबकि दूसरे ने जरूरी चीजों को खरीदा तो बोहलोल साहिब ने जवाब दिया सुन यहूदी तूँ ब्याज पर पैसा देता है तथा और भी गलत तरीकों से धन कमाता है इस कारण पाप की कमाई हमेशा पाप के कामों में ही लगती वहीं दूसरी और वह साधारण मेहनतकश व्यापारी है जो बड़ी मेहनत से धन कमाता है इस लिए हक की कमाई सदैव नेक कामों में ही लगती है।
गलत तरीकों से अर्जित आय का दान देने से सदैव पाप ही उपजता है

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