Behlol dana aur sonay ka sikka
7.बोहलोल साहिब और सोने का सिक्का
शाही परिवार से तालुक रखने वाले बोहलोल साहिब एक सोने के सिक्के से बच्चों की तरह खेल रहे थे। कभी वह उसको उंगली पर नचाते था तो कभी पहिये की तरह घुमाते।
एक सुनार उनका यह खेल देख रहा था। उसने उन्हें पागल समझ कर कहा। तुम्हे इस एक सिक्के से खेलने में मज़ा तो नहीं आ रहा होगा। तुम यह सिक्का मुझे दे दो। मैं इसके बदले में तुम्हे दस सिक्के दूँगा। उसने जेब से सिक्के निकाल कर बोहलोल साहिब को दिखाये।
ठीक है। मैं यह सिक्का तुम्हे अभी दे देता हूँ मगर एक है।
बोहलोल साहिब ने कहा।
वह क्या। सुनार ने पूछा पहले आप मुझे गधे की तरह ढ़ीचूँ ढ़ीचूँ की आवाज़ निकाल कर दिखाए
वह क्या। सुनार ने पूछा पहले आप मुझे गधे की तरह ढ़ीचूँ ढ़ीचूँ की आवाज़ निकाल कर दिखाए
बोहलोल साहिब ने कहा।
उस धोखेबाज़ ने सोचा कि इस दीवाने के सामने गधे की आवाज़ निकालने में क्या हर्ज है। इस लिये वह शुरू हो गया और गधे की तरह रेंकने लगा।
बोहलोल हसाँ। अजब गधे हो भाई। तुमने मेरे सोने के सिक्के को फौरन पहचान लिया और मैं गधा भी नहीं। तो भला मैं तुम्हारे ताँबे के सिक्के को क्यों न पहचानता। वह सुनार इस क़द्र शर्मिन्दा हुआ के भरे बाजार आंखें नीची कर रह गया।
उस धोखेबाज़ ने सोचा कि इस दीवाने के सामने गधे की आवाज़ निकालने में क्या हर्ज है। इस लिये वह शुरू हो गया और गधे की तरह रेंकने लगा।
बोहलोल हसाँ। अजब गधे हो भाई। तुमने मेरे सोने के सिक्के को फौरन पहचान लिया और मैं गधा भी नहीं। तो भला मैं तुम्हारे ताँबे के सिक्के को क्यों न पहचानता। वह सुनार इस क़द्र शर्मिन्दा हुआ के भरे बाजार आंखें नीची कर रह गया।

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